देश के लाखों कुम्हार दिवाली के लिए सालों भर इंतज़ार करते हैं। पूरे साल पनियाई हुई दाल के साथ सूखी रोटी खाने के बाद दिवाली उनके लिए ऐसा दिन होता है, जब वो दिन भर अपने मिट्टी के दीये, घरौंदे वगैरह बेच कर रात को बच्चों के लिए एक मिठाई का डब्बा खरीद कर घर ले जा सकते हैं। दस साल पहले दिवाली उनके लिए उत्सव का दिन होता था, महाजनों के कर्ज उतारने का दिन होता था, पटाखे जलाने का दिन हो होता था। महंगाई बढ़ती गई, कर्ज उतारना मुश्किल होता गया, और पटाखे; बच्चों को फुसला दिया कि बेकार चीज़ है, हाथ जल जाएंगे। अब दिवाली के दिन बस मुट्ठी भर दीये बिक जाएँ और गुज़ारा हो जाए तो गनीमत हो।
दोस्तों, इस साल बस मिट्टी के दीये ही जलाना। बिजली के बल्बों से तुम्हारे घर तो जगमगाएंगे, लेकिन कितनों लोगों की दिवाली अंधेरे में बीतेगी। आधुनिकता को थोड़ी फुर्सत देते हैं, इस दिवाली को दिल और दीये से मानते हैं। आखिर दीपावली, अर्थात दीप+अवली; दीपों की कतार। बल्ब के लड़ियों की नहीं। :)
दोस्तों, इस साल बस मिट्टी के दीये ही जलाना। बिजली के बल्बों से तुम्हारे घर तो जगमगाएंगे, लेकिन कितनों लोगों की दिवाली अंधेरे में बीतेगी। आधुनिकता को थोड़ी फुर्सत देते हैं, इस दिवाली को दिल और दीये से मानते हैं। आखिर दीपावली, अर्थात दीप+अवली; दीपों की कतार। बल्ब के लड़ियों की नहीं। :)
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