आज सुबह जब बरौनी से अपने गाँव जाने के लिए टेम्पू (एक बड़ा सा ऑटोरिक्शा जिसे 'विक्रम' भी कहते हैं) में सवार हुआ, तो ऐसे हर मौके पर जैसा मेरे साथ होता है, मन थोड़ा असहज़ था। राजधानी एक्सप्रेस की साफ़ सुथरी, वातानुकूलित बर्थ पर भी रेलवे की सफ़ेद, प्रेस की हुई चादर बिछाकर सोने के बाद, जब ओवरब्रिज पर अधेड़-उम्र का एक अधनंगा, फाइलेरिया से सूजी टांग लिए आपको कातर दृष्टि से देखे, तो उससे नज़रें नहीं मिल पातीं। जीन्स की पिछली जेब में हाथ डालकर, जो थोड़ा भी मिले, उसे थमा कर जल्दी से निकल जाना ही मेरी नैतिक बैसाखी है।
घर पहुँचने के बाद जलपान के दौरान ऐसी ही बातों के सिलसिले में एक पुरानी बात का जिक्र हो आया। तब उम्र करीब 15-16 साल रही होगी। सपरिवार हम कहीं जा रहे थे। रेलवे स्टेशन से निकलते वक़्त मेरी छोटी बहन की नज़र एक फेरीवाले पर पड़ी, जो बैठा कुछ छोटी-मोटी, घर की बनाई, पन्नी में लपेटी खाने की चीज़ें बेचने की कोशिश रहा था। वो बार बार माँ से ज़िद करने लगी कि हम उस बेचारे से कोई चीज़ खरीद लें। पहले तो माँ ने उसे समझाया, वो चीज़ें ठीक से बनाई नहीं, स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं, हमें जरुरत नहीं, आदि। लेकिन वो अड़ी रही, और आखिर हमने उससे एक पापड़नुमा पैकेट खरीद ही लिया।
ट्रैन के आ जाने तक हम उसी फेरीवाले को निहारते रहे। हर आने-जाने वाले को उसी उम्मीद की नज़र से लगभग बुलाता सा, और क़दमों के गुज़रते ही गुज़रते उसके चेहरे पर क्षणिक निराशा, उपेक्षा के भाव; मेरी बहन देखते ही देखते फूट-फूट कर रोने लगी। 'मां, इस बेचारे से कोई सामान क्यों नहीं लेता? कैसा बुरा लगता होगा इसे!'
ट्रैन के आ जाने तक हम उसी फेरीवाले को निहारते रहे। हर आने-जाने वाले को उसी उम्मीद की नज़र से लगभग बुलाता सा, और क़दमों के गुज़रते ही गुज़रते उसके चेहरे पर क्षणिक निराशा, उपेक्षा के भाव; मेरी बहन देखते ही देखते फूट-फूट कर रोने लगी। 'मां, इस बेचारे से कोई सामान क्यों नहीं लेता? कैसा बुरा लगता होगा इसे!'
शायद ऐसा ही कुछ देखकर फैज़ ने लिख दिया, "और भी गम हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा"।
उसके बाद तो काफी वक़्त गुज़रा, दुनिया की पहचान हुई। औरों की तरह हमारे विश्वास पर भी आक्षेप हुए, भावनाओं पर भी प्रहार हुए, हृदय कठोर होता गया, और ऐसे रोते हुए प्रश्नों को हमने जब अनसुना नहीं किया, तब अर्थशास्त्र की किताबों की लोरियां सुनाकर, बहलाकर सुला दिया।
उसके बाद तो काफी वक़्त गुज़रा, दुनिया की पहचान हुई। औरों की तरह हमारे विश्वास पर भी आक्षेप हुए, भावनाओं पर भी प्रहार हुए, हृदय कठोर होता गया, और ऐसे रोते हुए प्रश्नों को हमने जब अनसुना नहीं किया, तब अर्थशास्त्र की किताबों की लोरियां सुनाकर, बहलाकर सुला दिया।
पर, जैसा ग़ालिब ने कहा, दिल ही तो है, न संगो-खिश्त, दर्द से भर न जाए क्यों?
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