पंचिंग बैग कोई अनसुनी सी चीज नहीं है। डमी भी कहते हैं। वही, जिसके ऊपर मुक्केबाज़ अभ्यास करते हैं। सामाजिक परिपेक्ष में देखा जाए, तो सर्वसम्मति से हिन्दू धर्म को एक पंचिंग बैग के तौर पर टांग दिया गया है, जिसपर धर्मनिरपेक्ष रणबांकुरे आए दिन मुक्केबाज़ी का अभ्यास करते पाए जाते हैं।
डमी का चुनाव करने में मुक्केबाज़ कुछ बातों का ध्यान रखते हैं, जैसे कि वो इतना सख्त न हो कि मारने वाले को चोट पहुंचे। लिहाज़ा, हिन्दू धर्म इस मापदंड पर भी बिलकुल खड़ा उतरता है। सावन के सोमवारी व्रत करने की बात कबूलने में एक आधुनिक हिन्दू युवा को खिल्ली उड़ाये जाने का डर रहता है; किसी और से नहीं, बल्कि अपने ही दोस्तों से। वैसे रोजा तो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से लेकर राजनेता-फिल्म स्टार भी रखते हैं और बिलकुल खुल कर: इसमें तो कोई संकीर्ण मानसिकता की बात हुई ही नहीं। गौ-हत्या के विरोध में मुंह खोले नहीं कि औरों से पहले अपने हिन्दू डूड और एंजेल प्रिया सरीखे लोग ही मुंह में धर्मनिरपेक्षता की चादर ठूंसने को तैयार मिलेंगे। कोई नई बात नहीं, दलित कल्याण से लेकर राम मंदिर जैसे मसले पर, जिसे मौका मिला दू-चार फैट देता गया। उम्मीद है मेरे इस लेख को भी ज्यादा नहीं तो एकाध मुक्का लग ही जाएगा।
रणबांकुरों को इल्म ही नहीं कि इधर वो पंचिंग बैग पर अपनी शौर्यगाथा लिख रहे हैं, उधर उनकी ओर तलवारें बढ़ रही हैं। जब बात हलक तक आएगी, हरे के अंधे को धर्मनिरपेक्षता की सफ़ेद चादर भी भगवा ही दिखेगी, और तब इन सेक्युलर शूरवीरों को एहसास होगा कि जिस नर्म चमड़े के बने डमी को वो मुकियाने में लगे थे, उसी चमड़े से एक धनुष की प्रत्यंचा भी बन सकती थी, जिसके उपयोग से कोई तलवार पास भी न फटकने पाती।
खैर, वक़्त रहते समझ गए तो ठीक। तब तक या तो ये पंचिंग की प्रैक्टिस के दर्शन का लुत्फ़ उठाइये, या फिर इस भगवे बैग में कुछ पत्थर भर दिए जाएँ। जरा देखें तो, मुक्कों में कितनी जान है।
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