2014 चुनाव में जो जबर्दस्त मोदी लहर चली, उसके बाद कई मायनों में हिंदुओं के आत्मविश्वास में काफी वृद्धि हुई है। वस्तुतः, मोदीजी कितना भी गुजरात मोडल का ढिंढोरा क्यूँ न पीट लें, विकास-पुरुष से बढ़कर साक्षात विकास-भगवान ही क्यूँ न बन जाएँ, बराक ओबामा की बीबी से राखी ही क्यों न बंधा लें; इतना तो हर कोई ही समझता है कि अगर मोदीजी के सीने को अगर किसी चीज़ ने छप्पन इंच का किया, तो वो है गोधरा। वो है हिन्दुत्व। बीजेपी का कमल श्वेत नहीं, भगवा है, और वो कमल तभी खिला, जब उसे 6 दिसंबर 1992 के सुबह की धूप मिली। लाज़मी है, जब बीजेपी शासन में आई, तो हिंदुओं को एक नया बल मिला, और हिन्दू मूर्खों को बकवास करने के कई नए मंच। एकतरफा प्यार में पड़े आशिक की तरह ये मूर्ख गण बीजेपी सरकार से कुछ ज्यादा ही भगवी उम्मीदें लगा कर जिस तरह के सपने पाल बैठे हैं, जब वो सपने टूटेंगे तो चुभन किसी और को नहीं, इन्हें ही होगी।
नीतिशाष्त्र में लिखा है कि एक कुशल शासक का कोई धर्म नहीं होता। एक राजा के लिए उसका राजधर्म ही सर्वोपरि है, व्यक्तिगत स्तर पर चाहे किसी भी धर्म में उसकी आस्था क्यों न हो। गोधरा के बाद के किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अटलजी ने भरी मीडिया के सामने मोदीजी को अपने राजधर्म पालन करने की नसीहत दे डाली। हालांकि उन्हें तुरंत पलट कर मोदीजी ने जवाब भी दे दिया था, लेकिन आज देखें तो ऐसा लगता है वो नसीहत उनकी नीति में घर कर गई। कुछ उदाहरण देखते हैं।
राम मंदिर निर्माण बीजेपी का हमेशा से ही चुनावी मुद्दा रहा है। लेकिन इन अठारह महीनों में मंदिर निर्माण तो खैर रहने ही दीजिये, क्या संघ या बीजेपी से एक भी विधायक ने राम लला के दर्शन को अयोध्या-भ्रमण किया? और तो और, मोदीजी ने तो यहाँ तक कह डाला कि देश को देवालयों से ज्यादा जरूरत शौचालयों की है! गलत कहा? जब धोने को लोटा न हो, तो जल किस से चढ़ाओगे? वहीं दूसरी तरफ, इतने व्यावहारिक प्रधान-सेवक के अनुयायी आज भी जाने किस सपने में 'राम लला हम आएंगे..." का गाना गाते हैं और "मुल्ला मुक्त भारत" का नारा देते हैं। एक न्यूज़ चैनल पर बीजेपी के नेता श्री राम माधव से साक्षात्कार में जब इन तथाकथित हिंदुत्ववादी मुद्दों पर प्रश्न किया गया, तो जवाब बस गोल-गोल मिला। इधर गौ-माता की रक्षा में अंधे लोग दलित-सीख-मुसलमानों पर अंकुश लगा रहे हैं, उधर मोदीजी नें कह डाला कि गौ-रक्षकों में से अधिकांशतः गुंडे-मवाली हैं। मोदीजी नयी-नयी योजनाएँ ला रहे हैं। गैर-नियोजित क्षेत्र में काम करने वाले बूढ़ों के लिए अटल पेंशन योजना है, लेकिन उससे ज्यादा इन बेचारों को रामलीला में एक मुसलमान कलाकार को अभिनय न करने देने की फिक्र है। युवाओं की असीम ऊर्जा को रोजगार में लगाने के लिए स्टार्ट-अप इंडिया प्रोग्राम है, लेकिन हमारे हिन्दू युवा इन दुनियादारी की चीजों से ऊपर उठ चुके हैं; वो गौ-सेवा और भगवा नेताबाजी के जरिये समाजसेवा के पक्षधर हैं। जन-साधारण को तकनीक से अवगत कराने के लिए डिजिटल-इंडिया प्रोग्राम है, लेकिन अपन तकनीक का उपयोग व्हाट्सप्प के जरिये बेतुके-गढे-सुने-सुनाये हिन्दू मिथकों को फैलाने में करते हैं। मोदीजी की निगाह आज विश्व पर है, लेकिन हमारी निगाह पड़ोस वाली मस्जिद में ही फंसी पड़ी दुख रही है। क्यों, मोदीजी बेवफा हो गए? ना, खुशफहमी तो आपकी थी।
इस बात को समझिए कि आपके अनुसार हिन्दू धर्म कितना भी महान क्यों न हो, भारत एक हिन्दू राष्ट्र नहीं है। इसके इतिहास की बात नहीं करना चाहता, पोस्ट वैसे ही काफी लंबा हो चला है। संविधान में भारत को "धर्मनिरपेक्ष" बताया है, और भारत के प्रधानमंत्री से आप उम्मीद करते हैं कि वो आपकी कोरी भावनाओं को संविधान से ऊपर तहरीज देंगे? आप भोले हैं। पहले तो आपने एक नेता, जो हर नेताओं की तरह चुनाव से पहले और चुनाव के बाद अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं; उसको अपना विवेक बेच भगवान जैसा दर्जा दिया। फिर अब उम्मीद लगाए हैं कि अंधरा छँटेगा, कमल खिलेगा, मंदिर बनेगा और मुल्ला मरेगा। सचमुच, आप बहुत भोले हैं|
श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा, 'भूखे भजन न होंहि गोपाला'। अर्थात, भूखे पेट भगवान की पूजा संभव नहीं है। हम युवा हैं। आइये, साथ मिल कर कोशिश करते हैं कि अगली बार जब हम चीन-बहिष्कार का नारा दें तो हमारी वाणी में बल हो। गीता में श्री कृष्ण ने भी कर्मयोग की सीख दी है; धर्मरक्षा पर नहीं। यही हमारे हिन्दू धर्म और इस्लाम अथवा ईसाई धर्म में एक मूल फर्क है। मोदीजी दिन में अट्ठारह घंटे काम करते हैं। आप कम से कम नौ तो कर लो? फिर वक़्त बचे, तो कर्पूरी स्थान में मिलते हैं। बोलिए हर हर महादेव बम भोले कैलाशपति!