Thursday, 19 May 2016

हिन्दी: तुम सा मीठा कुछ भी नहीं!

आजकल भागदौड़ बहुत है। महानगरों की सड़कों पर लाल बत्ती खुलते ही गोलियों की तरह छूटती गाडियाँ। राजीव चौक स्टेशन पर मेट्रो में किसी तरह भीड़ को चीर कर घुसने की जद्दोजहद। वक़्त काफी कीमती हो चला है। किसी के पास फुर्सत नहीं। ऐसा लगता है कि दुनिया रफ्तार पकड़ चुकी है, और इंसान के पास दौड़ने के अलावा कोई चारा नहीं। इसी भागदौड़ में काफी कुछ पीछे छूट गया। एक समय था जब हम पूरे गाँव भर बस बनियान-निकर में घूम आते थे; लेकिन आज कमरे से दस कदम भी दूर चलें तो जीन्स डाले बगैर काम नहीं चलता। आज भी गाँव में मुंडेर पर पास वाले फलाना जी बेफिक्र होकर लुंगी पहने, तोंद के ऊपर बनियान चढ़ाये, अपनी ही धुन में दातुन किए जाते हैं। वही डाबर वाला मंजन। टूथपेस्ट कोई सा भी लेने जाओ, 'कोलगेट' बोलकर मांगते हैं। कपड़े खरीदने हों तो वही पंकज ड्रेससेज वाली दुकान। विकल्प सीमित हैं। लेकिन सीमित होते हुए भी पर्याप्त। इधर हमारे पास विकल्पों की कमी नहीं। मिंत्रा है, अमेज़न है। फिल्प्कार्ट? हाँ वो भी है, लेकिन उतना अच्छा नहीं। झूठी कहिए या सच्ची, ये अच्छे-बुरे की कवायद दिलो-दिमाग में ऐसे घर कर गई कि कुछ भी पहले की तरह सरल नहीं रहा। टहलने के लिए अलग जूते, किसी पार्टी में जाने के लिए अलग, काम पर जाने के लिए अलग। कमरे में पहनने के लिए एक जोड़ी चप्पल, कमरे से बाहर निकल कर जाने के लिए दूसरी जोड़ी, थोड़ी महंगी वाली। निकर हो तो जॉकी का, जीन्स हो तो कम से कम लेवाइस। इतने विकल्पों के बीच दुनिया हमें लुभाने के लिए और भी खड़ी है। कोई इतने रूपए छूट दे रहा है, कहीं फलाना सेल चल रहा है। बजाज आल्मोंड ड्रॉप्स के विज्ञापन की तरह सीधे बाल घुँघराले किए जा रहे हैं, और घुँघराले बाल सीधे। क्या बोलते हैं, लेजर कट। "हम" कह कर बोलने की आदत को सुधारते सुधारते भाषा ही परिवर्तित हो गयी। शायद हम सभ्य हो गए, लेकिन वो पहले वाला अपनापन शायद अब नहीं रहा। जब छोटे थे तो बुजुर्ग कहते थे, खूब पढ़ो, बड़े आदमी बनो। बड़े आदमी बनने की जंग में उम्र बदली, शहर बदला, भाषा बदली, वेषभूषा बदली, आदतें बदली, संबंध बदले। पीछे देखो तो एक खट्टा-मीठा सा एहसास बतलाता है कि बेटा, तुम बदल गए। 

इसी दौड़ में एक अज़ीज़ चीज़ थोड़ी पराई हो गयी। हिन्दी। जी हाँ। औरों का तो पता नहीं, लेकिन अपना बचपन हिन्दी की गोद में गुज़रा। महीने की पहली और पंद्रहवीं तारीख को अखबार वाले का बेसब्री से इंतज़ार रहता था, और बरामदे में अखबार के फेंके जाने की आवाज़ को सुनते ही हम नाश्ता छोड़ कर दौड़ पड़ते थे, और अखबार वाले के लाख मना करने पर भी उसकी साइकिल से लटके झोले को खंगाल कर सुनिश्चित करते थे कि चम्पक का नया अंक आया या नहीं। नन्दन, नन्हें सम्राट, बालहंस; इन्हीं पत्रिकाओं में बचपन गुज़रा। कहानियों के जरिये भाषा से कब लगाव हो गया, पता ही नहीं चला। थोड़े बड़े हुए तो उन पत्रिकाओं की जगह कादंबनी ने ले ली। चम्पक की वो नन्ही बच्ची सी हिन्दी अब अपने पूरे यौवन में आ कर कुछ क्लिष्ट हो गयी, लेकिन हमें कहानियों के रसपान करने के साथ साथ लेखकों के गूढ विचारों को भी सराहना सिखा गयी। बगल वाले मकान के भैया जी के कमरे में जाते, तो उनकी नज़र बचा कर कभी कभी सरस-सलिल पर भी हाथ मार लिया करते थे। आजकल वो पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं या नहीं, पता नहीं। बच्चे भी अब कहाँ हिन्दी पढ़ते हैं। हैरी पॉटर, टिनटिन कॉमिक्स, फलाना मैन, ढिमकाना मैन शायद ज्यादा आकर्षक हो चुके। मुझे याद है, जब अङ्ग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में दाखिला लिया, तो घरवालों ने अँग्रेजी पत्रिकाएँ पढ़ने पर ज़ोर दिया। अब चम्पक का अँग्रेजी संस्करण लेने लगे। एक अजब सी विरक्ति महसूस हुई; अँग्रेजी में छपी उन कहानियों में वो रस, वो भाव ही नहीं था जो पहले हिन्दी में पढ़ने पर मिलता था। मेरा चीकू खरगोश जो हिन्दी में बोला करता था, उसके मुंह से निकले अँग्रेजी वाक्य उसे मेरी नज़र में पराया कर रहे थे। विद्रोह हुआ। लेकिन इसे मेरी भाषा की कमजोरी मान कर घर वालों ने दबा दिया। कुछ नयी अँग्रेजी पत्रिकाएँ दिलवाई गईं। विज़डम। छोटी सी, पतली सी हुआ करती थी। बेहद ही नीरस। करीब दसों-बीस अधपढ़े विज़डम जब जमा हो गए, तब बड़ी ही निराशा के साथ आखिर मन ने स्वीकार किया कि इसी में दिल लगाना है। धीरे धीरे, मन जमने लगा। विज़डम की जगह रीड़र्स-डाइजैस्ट ने ली। छठी कक्षा तक आते आते मुंशी प्रेमचंद, बाबा नागार्जुन और धर्मवीर भारती की रचनाओं के साथ साथ अँग्रेजी साहित्य भी पढ़ने लगे। पहली किताब थी, रोबर्ट लुइस स्टीवेनसन की 'ट्रैशर आईलैंड"। किताब ने ऐसा मन मोहा, कि अँग्रेजी साहित्य में हम डूबते चले गए और हिन्दी वहीं किनारे पर खड़ी हमें देखती रही। मुड़ कर हमने भी कई बार देखा, लेकिन वापस नहीं लौटे। बस, अपनी पुरानी संगिनी पर प्रेमवश मुस्करा देने के लिए। 

जब बड़े शहर में आए तो देखा कि अँग्रेजी का ज्ञान बड़ा ही लाभदायक है। आपको सामने वाले की नज़रों में तुरंत ही सभ्य बना देता है! स्कूल कॉलेज का अँग्रेजी माध्यम होना तो खैर अपनी जगह है, यहाँ तो होटल, रैस्टौरेंट, सिनेमा हाल, सब कुछ अँग्रेजी माध्यम हैं। खाना ऑर्डर करने काउंटर पर जाइए तो आपके जैसी ही एक भारतीय लड़की आपसे अँग्रेजी में पूछेगी कि आपका ऑर्डर क्या है। इसका औचित्य मुझे आज तक समझ नहीं आया। तकनीक-प्रोद्योगिकी के विकास ने अँग्रेजी की जगह और भी सुनिश्चित कर दी। कम्प्युटर में, फेस्बूक में, फोन पर - हिन्दी के पास ज्यादा जगह कहाँ है। बड़े बड़े इश्तिहार, सब अँग्रेजी में। ऐसा है कि किसी नयी लड़की से बात करो तो वो बातचीत की शुरुआत भी अपने उस खास लहजे वाली अँग्रेजी में बोल कर करती है। नौकरी के लिए साक्षात्कार जो अँग्रेजी में होता है सो अलग। हिन्दी माध्यम से पढे लोग हीन भावना के शिकार हो रहे हैं। देखने में अच्छे खासे, काफी ज़हीन; कमी बस इतनी कि फर्राटेदार अँग्रेजी नहीं बोल पाते। हिंदुस्तानी मानुस हिंदुस्तान में ही रह कर हिन्दी बोलने से कतरा रहा है। अँग्रेजी के इस्तेमाल से मुझे शिकायत नहीं; लेकिन हिन्दी की उपेक्षा पर अफसोस होना क्या गलत है? मुझे नहीं लगता। 

हमारा साहित्य, हमारी भाषा, हमारे जड़ों की पहचान है। हम में से जो लोग गाँव से आते हैं, वो इसे भली भांति समझ सकते हैं। सवा सेर गेहूं में किसान के दर्द का चित्रण जिस प्रकार हिन्दी कर सकती है, अन्य कोई भाषा नहीं। मातृभाषा यूं ही नहीं कहते। इसका वात्सल्य मातृ-तुल्य है। जहां से हम आए, वहाँ कोई जादुई स्कूल नहीं था। वहाँ कोई परम शक्तिमान मनुष्य नहीं था। अगर था तो क्या? एक निर्धन के घर से महीनो बाद उठ रहे चूल्हे का धुआँ। सूखी बावड़ी के किनारे लू के थेपडों में झूलते दो-चार ठूंठ। टन-टन की आवाज़ के साथ बैलगाड़ी में जोंते दो बैल। उन दिनों लेजर कट नहीं था। वही, नारियल के तेल लगे, दो चोटियों में गूँथे बालों वाली हमारी बचपन की संगिनियाँ; जिन चोटियों को हम बदमाशी में कभी खींच भी दिया करते थे। आईपीएल नहीं था। दंगल था, गली-क्रिकेट था। एसी नहीं था, ताड़ वाले पंखे थे। इन चित्रों को सजीव करने वाली कोई भाषा अगर हो सकती है, तो वह बस हिन्दी है क्योंकि एहसासों को शब्दों का जब रूप देना हमने सीखा, हिन्दी में ही सीखा। 
हैरी पॉटर जरूर पढ़ें, लेकिन प्रेमचंद के पूस की रात को भूलें नहीं। रोमियो और जूलिएट की प्रेम कहानी में आह्लादित जरूर हों, लेकिन अर्जुन-उर्वशी के प्रेमोन्माद को महसूस करना भूल न जाएँ। पाश्चात्य सभ्यता की ऊंचाइयों को चित्रित करने वाले साहित्य का जरूर अध्ययन करें; लंदन के 10-बेकर स्ट्रीट में रहने वाले शर्लाक होम्स की कहानियों से जरूर रोमांचित हों, लेकिन ऐसा न हो कि गाहे-बगाहे अगर कोई व्योमकेश बक्शी का नाम ले तो आप अनभिज्ञ पाये जाएँ। अपने एप्पल के फोन में अगर संभव हो तो थोड़ी सी जगह हिन्दी को भी दें। अँग्रेजी आवश्यक जरूर है, परंतु इसका ये अर्थ कतई नहीं कि इसकी कीमत हिन्दी को चुकानी पड़े। संस्कृत का जो हश्र हुआ, हिन्दी का न हो, ऐसा प्रयास करना हमारा दायित्व और धर्म दोनों है। 

दुनिया में बहुत भागदौड़ है। कहीं इस भागदौड़ में हमारे जड़ों के साथ साथ हिन्दी भी हमसे दूर न हो जाए। अगर अँग्रेजी के साथ कदम से कदम मिलाना ही है, तो कम से कम हिन्दी का दामन तो थामे रह ही सकते हैं। गर्व कीजिये, आप हिंदीभाषी हैं। :)